बिहार में महिला सशक्तिकरण और ग्रामीण विकास की दिशा में 'जीविका' (Jeevika) योजना एक नई क्रांति लिख रही है। नए साल के दूसरे दिन यानी 2 जनवरी 2026 को बिहार के ग्रामीण विकास मंत्री श्रवण कुमार ने एक उत्साहजनक रिपोर्ट पेश करते हुए बताया कि कैसे राज्य की हजारों महिलाएं अब मधुमक्खी पालन (Beekeeping) के जरिए न केवल आत्मनिर्भर हो रही हैं, बल्कि बिहार की अर्थव्यवस्था में भी मिठास घोल रही हैं।
शहद उत्पादन का यह मॉडल आज बिहार की ग्रामीण महिलाओं के लिए घर बैठे रोजगार का सबसे बड़ा और भरोसेमंद जरिया बन चुका है।
मुजफ्फरपुर से शुरू हुआ सफर, अब 20 जिलों में विस्तार
मंत्री श्रवण कुमार ने पत्रकारों से बातचीत करते हुए इस योजना की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि साझा की। उन्होंने बताया कि इस पहल की नींव वर्ष 2009 में मुजफ्फरपुर जिले से एक छोटे से प्रयोग (Pilot Project) के रूप में रखी गई थी। तब किसी ने नहीं सोचा था कि यह प्रयोग एक दिन पूरे राज्य के लिए मिसाल बनेगा।
आज यह योजना बिहार के 20 जिलों तक फैल चुकी है। मुजफ्फरपुर, वैशाली, समस्तीपुर और पूर्वी चंपारण जैसे जिले अब शहद उत्पादन के प्रमुख केंद्र बनकर उभरे हैं। जीविका दीदियों द्वारा तैयार किया गया यह शहद अब केवल बिहार तक सीमित नहीं है, बल्कि अपनी शुद्धता के कारण देश-विदेश में अपनी पहचान बना चुका है।
आंकड़ों की जुबानी: आर्थिक बदलाव की कहानी
बिहार में मधुमक्खी पालन का दायरा कितनी तेजी से बढ़ा है, इसे निम्नलिखित आंकड़ों से समझा जा सकता है:
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कुल जुड़ी महिलाएं: वर्तमान में राज्य के 90 प्रखंडों की करीब 11,855 महिलाएं सीधे तौर पर इस व्यवसाय से जुड़ी हैं।
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सालाना उत्पादन मूल्य: ये महिलाएं हर साल 10 से 12 करोड़ रुपये मूल्य के शहद का उत्पादन कर रही हैं।
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मासिक आय: मधुमक्खी पालन से जुड़ी प्रत्येक महिला औसतन 10 हजार रुपये प्रति माह की कमाई कर रही है।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह आय उन्हें घर के कामकाज के साथ-साथ मिल रही है, जिससे उनके जीवन स्तर में बड़ा सुधार आया है।
हिमाचल से लेकर विदेशों तक का सफर
जीविका दीदियों द्वारा उत्पादित शहद की गुणवत्ता इतनी उच्च है कि इसकी मांग अंतरराष्ट्रीय बाजारों में भी है। मंत्री ने बताया कि शहद के प्रोसेसिंग और पैकेजिंग के लिए इसे हिमाचल प्रदेश की एक प्रतिष्ठित कंपनी को भेजा जाता है। वहां से उचित ब्रांडिंग और पैकेजिंग के बाद इसे भारत के अन्य राज्यों और विदेशों में निर्यात (Export) किया जाता है।
यह मॉडल दर्शाता है कि यदि ग्रामीण महिलाओं को सही प्रशिक्षण और संसाधन उपलब्ध कराए जाएं, तो वे ग्लोबल सप्लाई चेन का हिस्सा बन सकती हैं।
ग्रामीण अर्थव्यवस्था और महिला सशक्तिकरण
मधुमक्खी पालन न केवल शहद देता है, बल्कि यह परागण (Pollination) के जरिए फसलों की पैदावार बढ़ाने में भी सहायक होता है। श्रवण कुमार ने जोर देकर कहा कि यह व्यवसाय महिलाओं के आर्थिक सशक्तिकरण का एक स्थायी और आसान माध्यम है।
सरकार की यह पहल महिलाओं को 'निर्णय लेने की शक्ति' दे रही है। जब ग्रामीण महिलाएं आर्थिक रूप से स्वतंत्र होती हैं, तो इसका सीधा असर बच्चों की शिक्षा और परिवार के स्वास्थ्य पर पड़ता है। यह योजना वास्तव में बिहार की ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ को मजबूत कर रही है।